यूनिवर्सिटी ग्रांट्स कमीशन (यूजीसी) द्वारा यूनिवर्सिटी और कॉलेजों समेत उच्च शिक्षण संस्थानों के लिए मेंटल हेल्थ और वेल-बीइंग पर गाइडलाइन का ड्राफ्ट जारी किया गया है। इसके तहत हर 100 छात्रों पर एक साइकोलॉजिस्ट या मेंटल हेल्थ प्रोफेशनल की नियुक्ति अनिवार्य होगी। सभी विश्वविद्यालयों और कॉलेजों को डेडिकेटेड मेंटल हेल्थ और वेल-बीइंग सेंटर स्थापित करना होगा। साथ ही मेंटल हेल्थ मॉनिटरिंग कमेटी के माध्यम से इसकी निगरानी करनी होगी। यूजीसी ने इस ड्राफ्ट पर सभी स्टेक होल्डर से 29 जनवरी 2026 तक सुझाव मांगे हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि क्लासरूम का दबाव, प्रतियोगी माहौल, फेल होने का डर, भविष्य की अनिश्चितता, अकेलापन और सोशल आइसोलेशन वर्तमान समय में छात्र जीवन का हिस्सा बन चुके हैं। लेकिन अब इन मानसिक संघर्षों को केवल व्यक्तिगत कमजोरी कह कर नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है, इसलिए यह कदम उठाया जा रहा है। संस्थानों के समक्ष ये चुनौतियां : संस्थानों के समक्ष साइकोलॉजिस्ट नियुक्ति को लेकर कई चुनौतियां हैं। क्योंकि छात्रों की संख्या के अनुपात में प्रशिक्षित साइकोलॉजिस्ट की कमी है। इसके अलावा ग्रामीण क्षेत्र के उच्च शिक्षण संस्थान सीमित संसाधन में संचालित किए जा रहे हैं। ऐसे में 100 छात्रों पर एक साइकोलॉजिस्ट की नियुक्ति से आर्थिक बोझ बढ़ेगा। छात्रों में तनाव व डिप्रेशन कम करने में मदद करेगा उच्च शिक्षा में हर 100 छात्रों पर एक योग्य साइकोलॉजिस्ट की नियुक्ति न केवल समय पर सहायता सुनिश्चित करेगी, बल्कि छात्रों में तनाव और डिप्रेशन जैसी समस्याओं को कम करने में भी मदद करेगी। मैं उम्मीद करता हूं कि सभी संस्थान इसे गंभीरता से लागू करेंगे और कैंपस में मानसिक स्वास्थ्य को स्थायी रूप से मजबूत बनाएंगे। संस्थान क्या करेंगे… सुप्रीम आदेश से बनी नीति यूजीसी ने यह ड्राफ्ट सुप्रीम कोर्ट के 2025 के एक फैसले के निर्देशों के बाद बनाया है। कोर्ट ने कहा था कि छात्रों की आत्महत्या शिक्षा व्यवस्था की सामूहिक विफलता है। उच्च शिक्षा संस्थानों के लिए केंद्र सरकार समान राष्ट्रीय मेंटल हेल्थ नीति बनाए।- डॉ. परवेज हसन, एचओडी, साइकोलॉजी पीजी
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